लगातार रहने वाला कमर दर्द केवल कुछ दिनों की असुविधा नहीं होता। जब दर्द कई सप्ताह या महीनों तक बना रहता है, तो इसका असर व्यक्ति की नींद, काम, चलने-फिरने, और दैनिक गतिविधियों पर पड़ सकता है। कई लोग ऐसे दर्द से राहत पाने के लिए बार-बार दर्दनिवारक या एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाओं का सहारा लेते हैं। शुरुआत में आराम महसूस हो सकता है, लेकिन दवा का असर खत्म होने के बाद दर्द दोबारा शुरू हो जाता है।
ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि दर्द कम होना और दर्द के मूल कारण का इलाज होना दो अलग-अलग बातें हैं। यदि कमर दर्द किसी डिस्क बल्ज, हर्निएटेड डिस्क, या नस पर दबाव जैसी संरचनात्मक समस्या से जुड़ा है, तो केवल दवा उस संरचनात्मक समस्या को दूर नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में उचित जांच के बाद बिना सर्जरी के उपचार जैसे नॉन-सर्जिकल स्पाइनल डिकम्प्रेशन ट्रीटमेंट पर विचार किया जा सकता है।
क्रॉनिक लोअर बैक पेन क्यों होता है?
कमर दर्द के कई संभावित कारण हो सकते हैं। इनमें मांसपेशियों में खिंचाव, गलत पोश्चर, लंबे समय तक बैठना, शारीरिक निष्क्रियता, और उम्र के साथ रीढ़ में होने वाले बदलाव शामिल हैं।
कुछ मरीजों में समस्या इंटरवर्टिब्रल डिस्क से जुड़ी होती है। रीढ़ की प्रत्येक कशेरुक के बीच मौजूद डिस्क झटकों को सहने और रीढ़ को लचीला बनाए रखने में मदद करती है। समय के साथ इन डिस्क में पानी की मात्रा और ऊंचाई कम हो सकती है। इसे डिजनरेटिव डिस्क डिजीज कहा जाता है।
कभी-कभी डिस्क का बाहरी हिस्सा कमजोर होकर बाहर की ओर उभर जाता है। इसे डिस्क बल्ज या अधिक गंभीर स्थिति में हर्निएटेड/स्लिप डिस्क कहा जा सकता है। यदि यह उभरी हुई डिस्क आसपास की नस पर दबाव डालती है, तो कमर दर्द के साथ पैरों में दर्द, झनझनाहट, सुन्नपन, या कमजोरी भी महसूस हो सकती है।
सायटिका और स्पाइनल स्टेनोसिस जैसी स्थितियां भी कमर से पैर तक जाने वाले दर्द का कारण बन सकती हैं।
दवाइयों से दर्द दोबारा क्यों लौट सकता है?
दर्दनिवारक और एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाएं कई परिस्थितियों में डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपयोगी हो सकती हैं। वे दर्द और सूजन को नियंत्रित करने में मदद कर सकती हैं, जिससे मरीज को दैनिक गतिविधियां करने में आसानी होती है।
लेकिन यदि दर्द का कारण डिस्क का उभरना या नस पर मौजूद दबाव है, तो दवा आमतौर पर उस डिस्क को अपनी जगह वापस नहीं खींच सकती या नस पर दबाव को समाप्त नहीं कर सकती।
इसलिए कुछ मरीजों को दवा लेते समय आराम मिलता है, लेकिन दवा बंद करने या उसका प्रभाव कम होने के बाद लक्षण वापस आ सकते हैं।
लंबे समय तक कुछ दर्दनिवारक दवाइयाँ लेने से पेट में परेशानी, किडनी पर प्रभाव, और कुछ मरीजों में हृदय संबंधी जोखिम हो सकते हैं। इसलिए ऐसी दवाओं का लंबे समय तक उपयोग चिकित्सकीय सलाह के बिना नहीं करना चाहिए।
इसका मतलब यह नहीं है कि सभी दवाएं बेकार हैं। सही स्थिति में और सही अवधि के लिए डॉक्टर द्वारा निर्धारित दवाएं उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती हैं। समस्या तब होती है जब मरीज लगातार दवाओं पर निर्भर रहता है, लेकिन मूल कारण की जांच और उपचार नहीं कराया जाता।
नॉन-सर्जिकल स्पाइनल डीकंप्रेशन ट्रीटमेंट क्या है?
नॉन-सर्जिकल स्पाइनल डीकंप्रेशन ट्रीटमेंट एक नॉन-इनवेसिव उपचार पद्धति है, जिसे डिस्क-संबंधी समस्याओं में इस्तेमाल किया जाता है।
इस उपचार में कंप्यूटर-नियंत्रित प्रणाली के माध्यम से रीढ़ के प्रभावित हिस्से पर नियंत्रित डीकंप्रेशन बल लगाया जाता है। इसका उद्देश्य प्रभावित डिस्क पर तनाव को कम करना और आसपास की नसों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में सहायता करना है।
पात्र मरीजों में उपचार के दौरान बनने वाला नियंत्रित निगेटिव इंट्राडिस्कल प्रेशर डिस्क के भीतर दबाव को कम करता है। यही प्रेशर डिस्क के उभरे हिस्से को वापस अपनी जगह पर भेजने में भी मदद करता है।
सरल शब्दों में, जहां दवा मुख्य रूप से दर्द की अनुभूति को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है, वहीं नॉन-सर्जिकल स्पाइनल डीकंप्रेशन ट्रीटमेंट का उद्देश्य डिस्क और आसपास की संरचनाओं में मौजूद समस्या को लक्षित करना है।
डिस्क हाइड्रेशन की भूमिका
डीजनरेटेड डिस्क में पानी और पोषण की उपलब्धता कम हो सकती है तथा डिस्क की ऊंचाई घट सकती है। डिस्क की ऊंचाई कम होने से आसपास की संरचनाओं पर दबाव बढ़ सकता है।
नॉन-सर्जिकल स्पाइनल डीकंप्रेशन ट्रीटमेंट को डिस्क के भीतर द्रव और पोषण के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस्तेमाल किया जाता है। इससे डिस्क के कार्य और स्पाइनल मैकेनिक्स को बेहतर समर्थन मिल सकता है।
हालांकि, यह समझना महत्वपूर्ण है कि हर डिस्क समस्या एक जैसी नहीं होती। उपचार का परिणाम बीमारी की गंभीरता, डिस्क की स्थिति, नसों के दबाव, और मरीज की समग्र स्वास्थ्य स्थिति जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।
पूरक चिकित्सा पद्धतियां
केवल डीकंप्रेशन पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं हो सकता। कमर दर्द के समग्र प्रबंधन में फिजियोथेरेपी और पुनर्वास की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
व्यक्तिगत आवश्यकता के अनुसार उपचार में शामिल हो सकते हैं:
- कोर मांसपेशियों को मजबूत करने वाले व्यायाम
- स्पाइनल स्टेबिलाइजेशन एक्सरसाइज
- पोश्चर करेक्शन
- लचीलेपन के व्यायाम
- सही बैठने और उठने की तकनीक
- एर्गोनोमिक मार्गदर्शन
- दैनिक गतिविधियों में सुरक्षित मूवमेंट की ट्रेनिंग
इन उपायों का उद्देश्य रीढ़ को बेहतर सपोर्ट देना और उन आदतों को सुधारना है जो कमर पर अनावश्यक दबाव डाल सकती हैं।
कौन से मरीज़ पात्र हैं?
नॉन-सर्जिकल स्पाइनल डीकंप्रेशन ट्रीटमेंट कुछ चुनिंदा मरीजों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकता है, विशेष रूप से जब कमर दर्द डिस्क बल्ज, हर्निएटेड/स्लिप डिस्क, डिजनरेटिव डिस्क डिजीज, या डिस्क संबंधी साइटिका से जुड़ा हो।
लेकिन उपचार शुरू करने से पहले उचित मूल्यांकन आवश्यक है। डॉक्टर मरीज के लक्षणों, मेडिकल हिस्ट्री, शारीरिक और न्यूरोलॉजिकल परीक्षण, तथा आवश्यकता पड़ने पर MRI रिपोर्ट का मूल्यांकन कर सकते हैं।
यह भी याद रखना चाहिए कि MRI में दिखाई देने वाला हर डिस्क बल्ज दर्द का कारण नहीं होता। इसलिए रिपोर्ट को मरीज के वास्तविक लक्षणों के साथ जोड़कर समझना जरूरी है।
डॉक्टर से तुरंत संपर्क कब करें?
यदि कमर दर्द के साथ पैरों में बढ़ती कमजोरी, गंभीर सुन्नपन, चलने में तेजी से बढ़ती परेशानी, या ब्लैडर/बॉवेल कंट्रोल में बदलाव हो, तो इसे सामान्य कमर दर्द मानकर घरेलू उपचार जारी नहीं रखना चाहिए। ऐसे लक्षणों में तत्काल डॉक्टर से चेक करवाना जरूरी हो सकता है।
इसी तरह, यदि दर्द कई सप्ताह तक बना रहे, बार-बार लौटे, या दवाओं और सामान्य उपचार के बावजूद सुधार न हो, तो विशेषज्ञ से परामर्श लेना उचित है।
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